श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.32

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

येनोपसृष्टात्पुरुषाल्लोक उद्विजते भृशम्।

न बुधस्तद्वशं गच्छेदिच्छन्‍नभयमात्मनः॥ ३२

yenopasṛṣṭātpuruṣālloka udvijate bhṛśam|

na budhastadvaśaṃ gacchedicchannabhayamātmanaḥ|| 32

अर्थ

क्रोधके वशीभूत हुए पुरुषसे सभी लोगोंको बड़ा भय होता है; इसलिये जो बुद्धिमान् पुरुष ऐसा चाहता है कि मुझसे किसी भी प्राणीको भय न हो और मुझे भी किसीसे भय न हो, उसे क्रोधके वशमें कभी न होना चाहिये॥ ३२॥

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