श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.31

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

संयच्छ रोषं भद्रं ते प्रतीपं श्रेयसां परम्।

श्रुतेन भूयसा राजन्‍नगदेन यथाऽऽमयम्॥ ३१

saṃyaccha roṣaṃ bhadraṃ te pratīpaṃ śreyasāṃ param|

śrutena bhūyasā rājannagadena yathā''mayam|| 31

अर्थ

राजन्! जिस प्रकार ओषधिसे रोग शान्त किया जाता है—उसी प्रकार मैंने तुम्हें जो कुछ उपदेश दिया है, उसपर विचार करके अपने क्रोधको शान्त करो। क्रोध कल्याणमार्गका बड़ा ही विरोधी है। भगवान् तुम्हारा मंगल करें॥ ३१॥

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