श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.23

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अव्यक्तस्याप्रमेयस्य नानाशक्त्युदयस्य च।

न वै चिकीर्षितं तात को वेदाथ१ स्वसम्भवम्॥ २३

avyaktasyāprameyasya nānāśaktyudayasya ca|

na vai cikīrṣitaṃ tāta ko vedātha svasambhavam|| 23

अर्थ

वे किसी भी इन्द्रिय या प्रमाणके विषय नहीं हैं। महदादि अनेक शक्तियाँ भी उन्हींसे प्रकट हुई हैं। वे क्या करना चाहते हैं, इस बातको भी संसारमें कोई नहीं जानता; फिर अपने मूल कारण उन प्रभुको तो जान ही कौन सकता है॥ २३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—वेदास्य च संभ०।

    (मुद्रित पृष्ठ 466)

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