॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.11.22
केचित्कर्म वदन्त्येनं स्वभावमपरे नृप।
एके कालं परे दैवं पुंसः काममुतापरे॥ २२
kecitkarma vadantyenaṃ svabhāvamapare nṛpa|
eke kālaṃ pare daivaṃ puṃsaḥ kāmamutāpare|| 22
अर्थ
राजन्! इन परमात्माको ही मीमांसकलोग कर्म, चार्वाक स्वभाव, वैशेषिकमतावलम्बी काल, ज्योतिषी दैव और कामशास्त्री काम कहते हैं ॥ २२॥