विदुरजी! वहाँ पहुँचकर महाबाहु ध्रुवने अपना शंख बजाया तथा सम्पूर्ण आकाश और दिशाओंको गुँजा दिया। उस शंखध्वनिसे यक्ष-पत्नियाँ बहुत ही डर गयीं, उनकी आँखें भयसे कातर हो उठीं॥ ६॥
दध्मौ शङ्खं बृहद्बाहुः खं दिशश्चानुनादयन्।
येनोद्विग्नदृशः क्षत्तरुपदेव्योऽत्रसन्भृशम्॥ ६
विदुरजी! वहाँ पहुँचकर महाबाहु ध्रुवने अपना शंख बजाया तथा सम्पूर्ण आकाश और दिशाओंको गुँजा दिया। उस शंखध्वनिसे यक्ष-पत्नियाँ बहुत ही डर गयीं, उनकी आँखें भयसे कातर हो उठीं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.10.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 461) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/10/6/