॥ श्रीहरिः ॥
गत्वोदीचीं दिशं राजा रुद्रानुचरसेविताम्।
ददर्श हिमवद्द्रोण्यां पुरीं गुह्यकसंकुलाम्॥ ५
gatvodīcīṃ diśaṃ rājā rudrānucarasevitām|
dadarśa himavaddroṇyāṃ purīṃ guhyakasaṃkulām|| 5
अर्थ
उन्होंने उत्तर दिशामें जाकर हिमालयकी घाटीमें यक्षोंसे भरी हुई अलकापुरी देखी, उसमें अनेकों भूत-प्रेत-पिशाचादि रुद्रानुचर रहते थे॥ ५॥
गत्वोदीचीं दिशं राजा रुद्रानुचरसेविताम्।
ददर्श हिमवद्द्रोण्यां पुरीं गुह्यकसंकुलाम्॥ ५
उन्होंने उत्तर दिशामें जाकर हिमालयकी घाटीमें यक्षोंसे भरी हुई अलकापुरी देखी, उसमें अनेकों भूत-प्रेत-पिशाचादि रुद्रानुचर रहते थे॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.10.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 461) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/10/5/