ध्रुवजीपर असुरोंने अपनी दुस्तर माया फैलायी है, यह सुनकर वहाँ कुछ मुनियोंने आकर उनके लिये मंगल कामना की॥ २९॥
ध्रुवे प्रयुक्तामसुरैस्तां मायामतिदुस्तराम्।
निशाम्य तस्य मुनयः शमाशंसन् समागताः॥ २९
ध्रुवजीपर असुरोंने अपनी दुस्तर माया फैलायी है, यह सुनकर वहाँ कुछ मुनियोंने आकर उनके लिये मंगल कामना की॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.10.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 463) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/10/29/