श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.10.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

एवंविधान्यनेकानि त्रासनान्यमनस्विनाम्।

ससृजुस्तिग्मगतय आसुर्या माययासुराः॥ २८

evaṃvidhānyanekāni trāsanānyamanasvinām|

sasṛjustigmagataya āsuryā māyayāsurāḥ|| 28

अर्थ

क्रूरस्वभाव असुरोंने अपनी आसुरी मायासे ऐसे ही बहुत-से कौतुक दिखलाये, जिनसे कायरोंके मन काँप सकते थे॥ २८॥

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