॥ श्रीहरिः ॥
एवंविधान्यनेकानि त्रासनान्यमनस्विनाम्।
ससृजुस्तिग्मगतय आसुर्या माययासुराः॥ २८
evaṃvidhānyanekāni trāsanānyamanasvinām|
sasṛjustigmagataya āsuryā māyayāsurāḥ|| 28
अर्थ
क्रूरस्वभाव असुरोंने अपनी आसुरी मायासे ऐसे ही बहुत-से कौतुक दिखलाये, जिनसे कायरोंके मन काँप सकते थे॥ २८॥
एवंविधान्यनेकानि त्रासनान्यमनस्विनाम्।
ससृजुस्तिग्मगतय आसुर्या माययासुराः॥ २८
क्रूरस्वभाव असुरोंने अपनी आसुरी मायासे ऐसे ही बहुत-से कौतुक दिखलाये, जिनसे कायरोंके मन काँप सकते थे॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.10.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 463) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/10/28/