श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.8.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

स्वमेव धिष्ण्यं बहु मानयन्तं

यं वासुदेवाभिधमामनन्ति।

प्रत्यग्धृताक्षाम्बुजकोशमीष-

दुन्मीलयन्तं विबुधोदयाय॥ ४

svameva dhiṣṇyaṃ bahu mānayantaṃ

yaṃ vāsudevābhidhamāmananti|

pratyagdhṛtākṣāmbujakośamīṣa-

dunmīlayantaṃ vibudhodayāya|| 4

अर्थ

उस समय शेषजी अपने आश्रयस्वरूप उन परमात्माकी मानसिक पूजा कर रहे थे, जिनका वेद वासुदेवके नामसे निरूपण करते हैं। उनके कमलकोशसरीखे नेत्र बंद थे। प्रश्न करनेपर सनत्कुमारादि ज्ञानीजनोंके आनन्दके लिये उन्होंने अधखुले नेत्रोंसे देखा॥ ४॥✎ 1302 1303

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1302 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कमल-कोशसरीखे → कमलकोशसरीखे
  • #1303 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आश्रय-स्वरूप → आश्रयस्वरूप

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