श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.42

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

स इत्थमापृष्टपुराणकल्पः

कुरुप्रधानेन मुनिप्रधानः।

प्रवृद्धहर्षो भगवत्कथायां

सञ्चोदितस्तं प्रहसन्‍निवाह॥ ४२

sa itthamāpṛṣṭapurāṇakalpaḥ

kurupradhānena munipradhānaḥ|

pravṛddhaharṣo bhagavatkathāyāṃ

sañcoditastaṃ prahasannivāha|| 42

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! जब कुरुश्रेष्ठ विदुरजीने मुनिवर मैत्रेयजीसे इस प्रकार पुराणविषयक प्रश्न किये, तब भगवच्चर्चाके लिये प्रेरित किये जानेके कारण वे बड़े प्रसन्‍न हुए और मुसकराकर उनसे कहने लगे॥ ४२॥✎ 1587

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
तृतीयस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1587 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कुरु-श्रेष्ठ → कुरुश्रेष्ठ

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