श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

दानस्य तपसो वापि यच्चेष्टापूर्तयोः फलम्।

प्रवासस्थस्य यो धर्मो यश्‍च पुंस उतापदि॥ ३४

dānasya tapaso vāpi yacceṣṭāpūrtayoḥ phalam|

pravāsasthasya yo dharmo yaśca puṃsa utāpadi|| 34

अर्थ

दान, तप तथा इष्ट और पूर्त कर्मोंका क्या फल है? प्रवास और आपत्तिके समय मनुष्यका क्या धर्म होता है?॥ ३४॥

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