॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.7.33
श्राद्धस्य च विधिं ब्रह्मन् पितॄणां सर्गमेव च।
ग्रहनक्षत्रताराणां कालावयवसंस्थितिम्॥ ३३
śrāddhasya ca vidhiṃ brahman pitṝṇāṃ sargameva ca|
grahanakṣatratārāṇāṃ kālāvayavasaṃsthitim|| 33
अर्थ
ब्रह्मन्! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिके परस्पर अविरोधी साधनोंका, वाणिज्य, दण्डनीति और शास्त्रश्रवणकी विधियोंका, श्राद्धकी विधिका, पितृगणोंकी सृष्टिका तथा कालचक्रमें ग्रह, नक्षत्र और तारागणकी स्थितिका भी अलग-अलग वर्णन कीजिये॥ ३२-३३॥