श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तेषां संस्थां प्रमाणं च भूर्लोकस्य च वर्णय।

तिर्यङ्मानुषदेवानां सरीसृपपतत्त्रिणाम्।

वद नः सर्गसंव्यूहं गार्भस्वेदद्विजोद्भिदाम्॥ २७

teṣāṃ saṃsthāṃ pramāṇaṃ ca bhūrlokasya ca varṇaya|

tiryaṅmānuṣadevānāṃ sarīsṛpapatattriṇām|

vada naḥ sargasaṃvyūhaṃ gārbhasvedadvijodbhidām|| 27

अर्थ

मैत्रेयजी! उन मनुओंके वंश और वंशधर राजाओंके चरित्रोंका, पृथ्वीके ऊपर और नीचेके लोकों तथा भूर्लोकके विस्तार और स्थितिका भी वर्णन कीजिये तथा यह भी बताइये कि तिर्यक्, मनुष्य, देवता, सरीसृप (सर्पादि रेंगनेवाले जन्तु ) और पक्षी तथा जरायुज, स्वेदज, अण्डज और उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके प्राणी किस प्रकार उत्पन्‍न हुए ॥ २६-२७॥✎ 231

यह अर्थ श्लोक 26–27 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #231 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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