श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन एवं श्रवण अशेष दुःखराशिको शान्त कर देता है; फिर यदि हमारे हृदयमें उनके चरणकमलकी रजके सेवनका प्रेम जग पड़े, तब तो कहना ही क्या है?॥ १४॥
अशेषसंक्लेशशमं विधत्ते
गुणानुवादश्रवणं मुरारेः।
कुतः पुनस्तच्चरणारविन्द-
परागसेवारतिरात्मलब्धा ॥ १४
श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन एवं श्रवण अशेष दुःखराशिको शान्त कर देता है; फिर यदि हमारे हृदयमें उनके चरणकमलकी रजके सेवनका प्रेम जग पड़े, तब तो कहना ही क्या है?॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.7.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 264) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/7/14/