श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अशेषसंक्लेशशमं विधत्ते

गुणानुवादश्रवणं मुरारेः।

कुतः१ पुनस्तच्चरणारविन्द-

परागसेवारतिरात्मलब्धा ॥ १४

aśeṣasaṃkleśaśamaṃ vidhatte

guṇānuvādaśravaṇaṃ murāreḥ|

kutaḥ punastaccaraṇāravinda-

parāgasevāratirātmalabdhā || 14

अर्थ

श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन एवं श्रवण अशेष दुःखराशिको शान्त कर देता है; फिर यदि हमारे हृदयमें उनके चरणकमलकी रजके सेवनका प्रेम जग पड़े, तब तो कहना ही क्या है?॥ १४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—किं वा।

    (मुद्रित पृष्ठ 264)

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