श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.9

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

साध्यात्मः साधिदैवश्‍च साधिभूत इति त्रिधा।

विराट् प्राणो दशविध एकधा हृदयेन च॥ ९

sādhyātmaḥ sādhidaivaśca sādhibhūta iti tridhā|

virāṭ prāṇo daśavidha ekadhā hṛdayena ca|| 9

अर्थ

यह अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवरूपसे तीन प्रकारका, प्राणरूपसे दस प्रकारका* और हृदयरूपसे एक प्रकारका है॥ ९॥✎ 216 217 218 219 1300 1301

टिप्पणियाँ

  1. *

    दस इन्द्रियोंसहित मन अध्यात्म है, इन्द्रियादिके विषय अधिभूत हैं, इन्द्रियाधिष्ठाता देव अधिदैव हैं तथा प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय—ये दस प्राण हैं।

    (मुद्रित पृष्ठ 259)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #216 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #217 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #218 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #219 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #1300 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हुए। → हुए
  • #1301 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-तन्मात्रा → पंचतन्मात्रा

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