श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

स वै विश्‍वसृजां गर्भो देवकर्मात्मशक्तिमान्।

विबभाजात्मनाऽऽत्मानमेकधा दशधा त्रिधा॥ ७

sa vai viśvasṛjāṃ garbho devakarmātmaśaktimān|

vibabhājātmanā''tmānamekadhā daśadhā tridhā|| 7

अर्थ

वह विश्‍वरचना करनेवाले तत्त्वोंका गर्भ (कार्य) था तथा ज्ञान, क्रिया और आत्म-शक्तिसे सम्पन्‍न था। इन शक्तियोंसे उसने स्वयं अपने क्रमशः एक (हृदयरूप), दस (प्राणरूप) और तीन (आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक) विभाग किये॥ ७॥✎ 216 217 218 219 1300 1301

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #216 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #217 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #218 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #219 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #1300 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हुए। → हुए
  • #1301 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-तन्मात्रा → पंचतन्मात्रा

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