अर्थात् जब भगवान्ने अंशरूपसे अपने उस शरीरमें प्रवेश किया, तब वह विश्वरचना करनेवाला महत्तत्त्वादिका समुदाय एक-दूसरेसे मिलकर परिणामको प्राप्त हुआ। यह तत्त्वोंका परिणाम ही विराट् पुरुष है, जिसमें चराचर जगत् विद्यमान है॥ ५॥✎ 21621721821913001301
परेण विशता स्वस्मिन्मात्रया विश्वसृग्गणः।
चुक्षोभान्योन्यमासाद्य यस्मिल्ँलोकाश्चराचराः॥ ५
अर्थात् जब भगवान्ने अंशरूपसे अपने उस शरीरमें प्रवेश किया, तब वह विश्वरचना करनेवाला महत्तत्त्वादिका समुदाय एक-दूसरेसे मिलकर परिणामको प्राप्त हुआ। यह तत्त्वोंका परिणाम ही विराट् पुरुष है, जिसमें चराचर जगत् विद्यमान है॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 259) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/6/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)