श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

कालसंज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रमः।

त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत्॥ २

kālasaṃjñāṃ tadā devīṃ bibhracchaktimurukramaḥ|

trayoviṃśatitattvānāṃ gaṇaṃ yugapadāviśat|| 2

अर्थ

मैत्रेय ऋषिने कहा—सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ने जब देखा कि आपसमें संगठित न होनेके कारण ये मेरी महत्तत्त्व आदि शक्तियाँ विश्‍वरचनाके कार्यमें असमर्थ हो रही हैं, तब वे कालशक्तिको स्वीकार करके एक साथ ही महत्तत्त्व, अहंकार, पंचभूत, पंचतन्मात्रा और मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ—इन तेईस तत्त्वोंके समुदायमें प्रविष्ट हो गये॥ १-२॥✎ 216 217 218 219 1300 1301

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #216 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #217 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #218 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #219 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #1300 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हुए। → हुए
  • #1301 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-तन्मात्रा → पंचतन्मात्रा

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