फिर उस विराट् विग्रहमें त्वचा उत्पन्न हुई; उसमें अपने अंश त्वगिन्द्रियके सहित वायु स्थित हुआ, जिस त्वगिन्द्रियसे जीव स्पर्शका अनुभव करता है॥ १६॥✎ 220
निर्भिन्नान्यस्य चर्माणि लोकपालोऽनिलोऽविशत्।
प्राणेनांशेन संस्पर्शं येनासौ प्रतिपद्यते॥ १६
फिर उस विराट् विग्रहमें त्वचा उत्पन्न हुई; उसमें अपने अंश त्वगिन्द्रियके सहित वायु स्थित हुआ, जिस त्वगिन्द्रियसे जीव स्पर्शका अनुभव करता है॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 260) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/6/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#220 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने