श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

निर्भिन्‍ने अक्षिणी त्वष्टा लोकपालोऽविशद्विभोः।

चक्षुषांशेन रूपाणां प्रतिपत्तिर्यतो भवेत्॥ १५

nirbhinne akṣiṇī tvaṣṭā lokapālo'viśadvibhoḥ|

cakṣuṣāṃśena rūpāṇāṃ pratipattiryato bhavet|| 15

अर्थ

इसी प्रकार जब उस विराट् देहमें आँखें प्रकट हुईं, तब उनमें अपने अंश नेत्रेन्द्रियके सहित—लोकपति सूर्यने प्रवेश किया, जिस नेत्रेन्द्रियसे पुरुषको विविध रूपोंका ज्ञान होता है॥ १५॥✎ 220

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #220 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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