श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.40

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

मार्गन्ति यत्ते मुखपद्मनीडै-

श्छन्दःसुपर्णैर्ऋषयो विविक्ते।✎ 1004 1005

यस्याघमर्षोदसरिद्वरायाः

पदं पदं तीर्थपदः प्रपन्‍नाः॥ ४०

mārganti yatte mukhapadmanīḍai-

śchandaḥsuparṇair:ṛṣayo vivikte|

yasyāghamarṣodasaridvarāyāḥ

padaṃ padaṃ tīrthapadaḥ prapannāḥ|| 40

अर्थ

मुनिजन एकान्त स्थानमें रहकर आपके मुखकमलका आश्रय लेनेवाले वेदमन्त्ररूप पक्षियोंके द्वारा जिनका अनुसन्धान करते रहते हैं तथा जो सम्पूर्ण पापनाशिनी नदियोंमें श्रेष्ठ श्रीगंगाजीके उद्गमस्थान हैं, आपके उन परम पावन पादपद्मोंका हम आश्रय लेते हैं॥ ४०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1004 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्छन्द:सुपर्णैऋर्षयो → श्छन्दःसुपर्णैऋर्ऋषयो
  • #1005 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्छन्द:सुपर्णैऋर्ऋषयो → श्छन्दःसुपर्णैर्ऋषयो

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