अत्यन्त बलवान् वायुने आकाशके सहित विकृत होकर रूपतन्मात्रकी रचना की और उससे संसारका प्रकाशक तेज उत्पन्न हुआ॥ ३३॥✎ 212213214
अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः।
ससर्ज रूपतन्मात्रं ज्योतिर्लोकस्य लोचनम्॥ ३३
अत्यन्त बलवान् वायुने आकाशके सहित विकृत होकर रूपतन्मात्रकी रचना की और उससे संसारका प्रकाशक तेज उत्पन्न हुआ॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.5.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 256) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/5/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)