श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.33

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः।

ससर्ज रूपतन्मात्रं ज्योतिर्लोकस्य लोचनम्॥ ३३

anilo'pi vikurvāṇo nabhasorubalānvitaḥ|

sasarja rūpatanmātraṃ jyotirlokasya locanam|| 33

अर्थ

अत्यन्त बलवान् वायुने आकाशके सहित विकृत होकर रूपतन्मात्रकी रचना की और उससे संसारका प्रकाशक तेज उत्पन्‍न हुआ॥ ३३॥✎ 212 213 214

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #212 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #213 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #214 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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