श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तैजसानीन्द्रियाण्येव ज्ञानकर्ममयानि च।

तामसो भूतसूक्ष्मादिर्यतः खं लिङ्गमात्मनः॥ ३१

taijasānīndriyāṇyeva jñānakarmamayāni ca|

tāmaso bhūtasūkṣmādiryataḥ khaṃ liṅgamātmanaḥ|| 31

अर्थ

तैजस अहंकारसे ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ हुईं तथा तामस अहंकारसे सूक्ष्म भूतोंका कारण शब्द-तन्मात्र हुआ और उससे दृष्टान्तरूपसे आत्माका बोध करानेवाला आकाश उत्पन्‍न हुआ॥ ३१॥✎ 212 213 214

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #212 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #213 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #214 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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