श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

वैकारिकस्तैजसश्‍च तामसश्चेत्यहं त्रिधा।

अहंतत्त्वाद्विकुर्वाणान्मनो वैकारिकादभूत्।

वैकारिकाश्‍च ये देवा अर्थाभिव्यञ्जनं यतः॥ ३०

vaikārikastaijasaśca tāmasaścetyahaṃ tridhā|

ahaṃtattvādvikurvāṇānmano vaikārikādabhūt|

vaikārikāśca ye devā arthābhivyañjanaṃ yataḥ|| 30

अर्थ

वह अहंकार वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) और तामस-भेदसे तीन प्रकारका है; अतः अहंतत्त्वमें विकार होनेपर वैकारिक अहंकारसे मन और जिनसे विषयोंका ज्ञान होता है वे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवता हुए॥ ३०॥✎ 212 213 214

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #212 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #213 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #214 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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