श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

साधु पृष्टं त्वया साधो लोकान् साध्वनुगृह्णता।

कीर्तिं वितन्वता लोके आत्मनोऽधोक्षजात्मनः॥ १८

sādhu pṛṣṭaṃ tvayā sādho lokān sādhvanugṛhṇatā|

kīrtiṃ vitanvatā loke ātmano'dhokṣajātmanaḥ|| 18

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी बोले—साधुस्वभाव विदुरजी! आपने सब जीवोंपर अत्यन्त अनुग्रह करके यह बड़ी अच्छी बात पूछी है। आपका चित्त तो सर्वदा श्रीभगवान्‌में ही लगा रहता है, तथापि इससे संसारमें भी आपका बहुत सुयश फैलेगा॥ १८॥✎ 210 211

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #210 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #211 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् में → श्रीभगवान्‌में

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