श्रीमैत्रेयजी बोले—साधुस्वभाव विदुरजी! आपने सब जीवोंपर अत्यन्त अनुग्रह करके यह बड़ी अच्छी बात पूछी है। आपका चित्त तो सर्वदा श्रीभगवान्में ही लगा रहता है, तथापि इससे संसारमें भी आपका बहुत सुयश फैलेगा॥ १८॥✎ 210211
साधु पृष्टं त्वया साधो लोकान् साध्वनुगृह्णता।
कीर्तिं वितन्वता लोके आत्मनोऽधोक्षजात्मनः॥ १८
श्रीमैत्रेयजी बोले—साधुस्वभाव विदुरजी! आपने सब जीवोंपर अत्यन्त अनुग्रह करके यह बड़ी अच्छी बात पूछी है। आपका चित्त तो सर्वदा श्रीभगवान्में ही लगा रहता है, तथापि इससे संसारमें भी आपका बहुत सुयश फैलेगा॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.5.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 255) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/5/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)