श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.4.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

विदुर उवाच

ज्ञानं परं स्वात्मरहःप्रकाशं

यदाह योगेश्‍वर ईश्‍वरस्ते।

वक्तुं भवान्‍नोऽर्हति यद्धि विष्णो-

र्भृत्याः स्वभृत्यार्थकृतश्‍चरन्ति॥ २५

jñānaṃ paraṃ svātmarahaḥprakāśaṃ

yadāha yogeśvara īśvaraste|

vaktuṃ bhavānno'rhati yaddhi viṣṇo-

rbhṛtyāḥ svabhṛtyārthakṛtaścaranti|| 25

अर्थ

विदुरजीने कहा—उद्धवजी! योगेश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णने अपने स्वरूपके गूढ़ रहस्यको प्रकट करनेवाला जो परमज्ञान आपसे कहा था, वह आप हमें भी सुनाइये; क्योंकि भगवान्‌के सेवक तो अपने सेवकोंका कार्य सिद्ध करनेके लिये ही विचरा करते हैं॥ २५॥

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