श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.8

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

तं त्वामहं ब्रह्म परं पुमांसं

प्रत्यक्स्रोतस्यात्मनि संविभाव्यम्।

स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाहं

वन्दे विष्णुं कपिलं वेदगर्भम्॥ ८

taṃ tvāmahaṃ brahma paraṃ pumāṃsaṃ

pratyaksrotasyātmani saṃvibhāvyam|

svatejasā dhvastaguṇapravāhaṃ

vande viṣṇuṃ kapilaṃ vedagarbham|| 8

अर्थ

कपिलदेवजी! आप साक्षात् परब्रह्म हैं, आप ही परम पुरुष हैं, वृत्तियोंके प्रवाहको अन्तर्मुख करके अन्तःकरणमें आपका ही चिन्तन किया जाता है। आप अपने तेजसे मायाके कार्य गुण-प्रवाहको शान्त कर देते हैं तथा आपके ही उदरमें सम्पूर्ण वेदतत्त्व निहित है। ऐसे साक्षात् विष्णुस्वरूप आपको मैं प्रणाम करती हूँ॥ ८॥

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