॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.33.7
अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान्
यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या
ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥ ७
aho bata śvapaco'to garīyān
yajjihvāgre vartate nāma tubhyam|
tepustapaste juhuvuḥ sasnurāryā
brahmānūcurnāma gṛṇanti ye te|| 7
अर्थ
अहो! वह चाण्डाल भी इसीसे सर्वश्रेष्ठ है कि उसकी जिह्वाके अग्रभागमें आपका नाम विराजमान है। जो श्रेष्ठ पुरुष आपका नाम उच्चारण करते हैं, उन्होंने तप, हवन, तीर्थस्नान, सदाचारका पालन और वेदाध्ययन—सब कुछ कर लिया॥ ७॥