श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

स त्वं भृतो मे जठरेण नाथ

कथं नु यस्योदर एतदासीत्।

विश्‍वं युगान्ते वटपत्र एकः

शेते स्म मायाशिशुरङ्‌घ्रिपानः॥ ४

sa tvaṃ bhṛto me jaṭhareṇa nātha

kathaṃ nu yasyodara etadāsīt|

viśvaṃ yugānte vaṭapatra ekaḥ

śete sma māyāśiśuraṅghripānaḥ|| 4

अर्थ

नाथ! यह कैसी विचित्र बात है कि जिनके उदरमें प्रलयकाल आनेपर यह सारा प्रपंच लीन हो जाता है और जो कल्पान्तमें मायामय बालकका रूप धारण कर अपने चरणका अँगूठा चूसते हुए अकेले ही वटवृक्षके पत्तेपर शयन करते हैं, उन्हीं आपको मैंने गर्भमें धारण किया॥ ४॥

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