॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.33.3
स एव विश्वस्य भवान् विधत्ते
गुणप्रवाहेण विभक्तवीर्यः।
सर्गाद्यनीहोऽवितथाभिसन्धि-
रात्मेश्वरोऽतर्क्यसहस्रशक्तिः ॥ ३
sa eva viśvasya bhavān vidhatte
guṇapravāheṇa vibhaktavīryaḥ|
sargādyanīho'vitathābhisandhi-
rātmeśvaro'tarkyasahasraśaktiḥ || 3
अर्थ
आप निष्क्रिय, सत्यसंकल्प, सम्पूर्ण जीवोंके प्रभु तथा सहस्रों अचिन्त्य शक्तियोंसे सम्पन्न हैं। अपनी शक्तिको गुणप्रवाहरूपसे ब्रह्मादि अनन्त मूर्तियोंमें विभक्त करके उनके द्वारा आप स्वयं ही विश्वकी रचना आदि करते हैं॥ ३॥