विदुरजी! इस प्रकार देवहूतिजीने कपिलदेवजीके बताये हुए मार्गद्वारा थोड़े ही समयमें नित्यमुक्त परमात्मस्वरूप श्रीभगवान्को प्राप्त कर लिया॥ ३०॥✎ 352
एवं सा कपिलोक्तेन मार्गेणाचिरतः परम्।
आत्मानं ब्रह्म निर्वाणं भगवन्तमवाप ह॥ ३०
विदुरजी! इस प्रकार देवहूतिजीने कपिलदेवजीके बताये हुए मार्गद्वारा थोड़े ही समयमें नित्यमुक्त परमात्मस्वरूप श्रीभगवान्को प्राप्त कर लिया॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.33.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 404) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/33/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#352 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को