श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.29

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

स्वाङ्गं तपोयोगमयं मुक्तकेशं गताम्बरम्।

दैवगुप्तं न बुबुधे वासुदेवप्रविष्टधीः॥ २९

svāṅgaṃ tapoyogamayaṃ muktakeśaṃ gatāmbaram|

daivaguptaṃ na bubudhe vāsudevapraviṣṭadhīḥ|| 29

अर्थ

उनके शरीरका पोषण भी दूसरोंके द्वारा ही होता था, किन्तु किसी प्रकारका मानसिक क्लेश न होनेके कारण वह दुर्बल नहीं हुआ। उसका तेज और भी निखर गया और वह मैलके कारण धूमयुक्त अग्‍निके समान सुशोभित होने लगा। उनके बाल बिथुर गये थे और वस्त्र भी गिर गया था; तथापि निरन्तर श्रीभगवान्‌में ही चित्त लगा रहनेके कारण उन्हें अपने तपोयोगमय शरीरकी कुछ भी सुधि नहीं थी, केवल प्रारब्ध ही उसकी रक्षा करता था॥ २८-२९॥✎ 351

यह अर्थ श्लोक 28–29 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #351 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् में → श्रीभगवान्‌में

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