श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

ब्रह्मण्यवस्थितमतिर्भगवत्यात्मसंश्रये ।

निवृत्तजीवापत्तित्वात्क्षीणक्लेशाऽऽप्तनिर्वृतिः ॥ २६

brahmaṇyavasthitamatirbhagavatyātmasaṃśraye |

nivṛttajīvāpattitvātkṣīṇakleśā''ptanirvṛtiḥ || 26

अर्थ

इस प्रकार जीवके अधिष्ठानभूत परब्रह्म श्रीभगवान्‌में ही बुद्धिकी स्थिति हो जानेसे उनका जीवभाव निवृत्त हो गया और वे समस्त क्लेशोंसे मुक्त होकर परमानन्दमें निमग्न हो गयीं॥ २६॥✎ 350 1315

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #350 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् में → श्रीभगवान्‌में
  • #1315 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): परमा-नन्दमें → परमानन्दमें

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