कुर्वन्त्यप्रतिषिद्धानि नित्यान्यपि च कृत्स्नशः॥ १६
ye tvihāsaktamanasaḥ karmasu śraddhayānvitāḥ|
kurvantyapratiṣiddhāni nityānyapi ca kṛtsnaśaḥ|| 16
अर्थ
जिनका चित्त इस लोकमें आसक्त है और जो कर्मोंमें श्रद्धा रखते हैं, वे वेदमें कहे हुए काम्य और नित्य कर्मोंका सांगोपांग अनुष्ठान करनेमें ही लगे रहते हैं॥ १६॥✎ 347
ये त्विहासक्तमनसः कर्मसु श्रद्धयान्विताः।
कुर्वन्त्यप्रतिषिद्धानि नित्यान्यपि च कृत्स्नशः॥ १६
जिनका चित्त इस लोकमें आसक्त है और जो कर्मोंमें श्रद्धा रखते हैं, वे वेदमें कहे हुए काम्य और नित्य कर्मोंका सांगोपांग अनुष्ठान करनेमें ही लगे रहते हैं॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.32.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 397) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/32/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#347 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीमधुसूदनभगवान् की → श्रीमधुसूदनभगवान्की