श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

ऐश्‍वर्यं पारमेष्ठ्यं च तेऽपि धर्मविनिर्मितम्।

निषेव्य पुनरायान्ति गुणव्यतिकरे सति॥ १५

aiśvaryaṃ pārameṣṭhyaṃ ca te'pi dharmavinirmitam|

niṣevya punarāyānti guṇavyatikare sati|| 15

अर्थ

इसी प्रकार पूर्वोक्त ऋषिगण भी अपने-अपने कर्मानुसार ब्रह्मलोकके ऐश्‍वर्यको भोगकर भगवदिच्छासे गुणोंमें क्षोभ होनेपर पुनः इस लोकमें आ जाते हैं॥ १५॥

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