उन्हीं ब्रह्माजीने मरीचि आदि प्रजापतियोंकी तथा मरीचि आदिने कश्यपादिकी और कश्यपादिने देव-मनुष्यादि प्राणियोंकी सृष्टि की। अतः इनमें एक ऋषिप्रवर नारायणको छोड़कर ऐसा कौन पुरुष हो सकता है, जिसकी बुद्धि स्त्रीरूपिणी मायासे मोहित न हो॥ ३७॥
तत्सृष्टसृष्टसृष्टेषु को न्वखण्डितधीः पुमान्।
ऋषिं नारायणमृते योषिन्मय्येह मायया॥ ३७
उन्हीं ब्रह्माजीने मरीचि आदि प्रजापतियोंकी तथा मरीचि आदिने कश्यपादिकी और कश्यपादिने देव-मनुष्यादि प्राणियोंकी सृष्टि की। अतः इनमें एक ऋषिप्रवर नारायणको छोड़कर ऐसा कौन पुरुष हो सकता है, जिसकी बुद्धि स्त्रीरूपिणी मायासे मोहित न हो॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 394) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/31/37/