श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.36

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

प्रजापतिः स्वां दुहितरं दृष्ट्वा तद्रूपधर्षितः।

रोहिद‍्भूतां सोऽन्वधावदृक्षरूपी हतत्रपः॥ ३६

prajāpatiḥ svāṃ duhitaraṃ dṛṣṭvā tadrūpadharṣitaḥ|

rohidbhūtāṃ so'nvadhāvadṛkṣarūpī hatatrapaḥ|| 36

अर्थ

एक बार अपनी पुत्री सरस्वतीको देखकर ब्रह्माजी भी उसके रूप-लावण्यसे मोहित हो गये थे और उसके मृगीरूप होकर भागनेपर उसके पीछे निर्लज्जतापूर्वक मृगरूप होकर दौड़ने लगे॥ ३६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें