॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.31.26
शायितोऽशुचिपर्यङ्के जन्तुः स्वेदजदूषिते।
नेशः कण्डूयनेऽङ्गानामासनोत्थानचेष्टने॥ २६
śāyito'śuciparyaṅke jantuḥ svedajadūṣite|
neśaḥ kaṇḍūyane'ṅgānāmāsanotthānaceṣṭane|| 26
अर्थ
जब उस जीवको शिशु-अवस्थामें मैली-कुचैली खाटपर सुला दिया जाता है, जिसमें खटमल आदि स्वेदज जीव चिपटे रहते हैं, तब उसमें शरीरको खुजलाने, उठाने अथवा करवट बदलनेकी भी सामर्थ्य न होनेके कारण वह बड़ा कष्ट पाता है॥ २६॥