फिर जो लोग उसका अभिप्राय नहीं समझ सकते, उनके द्वारा उसका पालन-पोषण होता है। ऐसी अवस्थामें उसे जो प्रतिकूलता प्राप्त होती है, उसका निषेध करनेकी शक्ति भी उसमें नहीं होती॥ २५॥
परच्छन्दं न विदुषा पुष्यमाणो जनेन सः।
अनभिप्रेतमापन्नः प्रत्याख्यातुमनीश्वरः॥ २५
फिर जो लोग उसका अभिप्राय नहीं समझ सकते, उनके द्वारा उसका पालन-पोषण होता है। ऐसी अवस्थामें उसे जो प्रतिकूलता प्राप्त होती है, उसका निषेध करनेकी शक्ति भी उसमें नहीं होती॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 392) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/31/25/