श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

परच्छन्दं न विदुषा पुष्यमाणो जनेन सः।

अनभिप्रेतमापन्‍नः प्रत्याख्यातुमनीश्‍वरः॥ २५

paracchandaṃ na viduṣā puṣyamāṇo janena saḥ|

anabhipretamāpannaḥ pratyākhyātumanīśvaraḥ|| 25

अर्थ

फिर जो लोग उसका अभिप्राय नहीं समझ सकते, उनके द्वारा उसका पालन-पोषण होता है। ऐसी अवस्थामें उसे जो प्रतिकूलता प्राप्त होती है, उसका निषेध करनेकी शक्ति भी उसमें नहीं होती॥ २५॥

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