॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.30.14
तत्राप्यजातनिर्वेदो भ्रियमाणः स्वयम्भृतैः।
ज२रयोपात्तवैरूप्यो मरणाभिमुखो गृहे॥ १४
tatrāpyajātanirvedo bhriyamāṇaḥ svayambhṛtaiḥ|
jarayopāttavairūpyo maraṇābhimukho gṛhe|| 14
अर्थ
फिर भी इसे वैराग्य नहीं होता। जिन्हें उसने स्वयं पाला था, वे ही अब उसका पालन करते हैं, वृद्धावस्थाके कारण इसका रूप बिगड़ जाता है, शरीर रोगी हो जाता है, अग्नि मन्द पड़ जाती है, भोजन और पुरुषार्थ दोनों ही कम हो जाते हैं। वह मरणोन्मुख होकर घरमें पड़ा रहता है और कुत्तेकी भाँति स्त्री-पुत्रादिके अपमानपूर्वक दिये हुए टुकड़े खाकर जीवन-निर्वाह करता है॥ १४-१५॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—जरया जात०।