इसे अपने पालन-पोषणमें असमर्थ देखकर वे स्त्री-पुत्रादि इसका पहलेके समान आदर नहीं करते, जैसे कृपण किसान बूढ़े बैलकी उपेक्षा कर देते हैं॥ १३॥
एवं स्वभरणाकल्पं तत्कलत्रादयस्तथा।
नाद्रियन्ते यथा पूर्वं कीनाशा इव गोजरम्॥ १३
इसे अपने पालन-पोषणमें असमर्थ देखकर वे स्त्री-पुत्रादि इसका पहलेके समान आदर नहीं करते, जैसे कृपण किसान बूढ़े बैलकी उपेक्षा कर देते हैं॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.30.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 386) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/30/13/