॥ श्रीहरिः ॥
यद्वनस्पतयो भीता लताश्चौषधिभिः सह।
स्वे स्वे कालेऽभिगृह्णन्ति पुष्पाणि च फलानि च॥ ४१
yadvanaspatayo bhītā latāścauṣadhibhiḥ saha|
sve sve kāle'bhigṛhṇanti puṣpāṇi ca phalāni ca|| 41
अर्थ
इसीसे भयभीत होकर ओषधियोंके सहित लताएँ और सारी वनस्पतियाँ समय-समयपर फल-फूल धारण करती हैं॥ ४१॥
यद्वनस्पतयो भीता लताश्चौषधिभिः सह।
स्वे स्वे कालेऽभिगृह्णन्ति पुष्पाणि च फलानि च॥ ४१
इसीसे भयभीत होकर ओषधियोंके सहित लताएँ और सारी वनस्पतियाँ समय-समयपर फल-फूल धारण करती हैं॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 384) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/29/41/