श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.36

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

एतद्भगवतो रूपं ब्रह्मणः परमात्मनः।

परं प्रधानं पुरुषं दैवं कर्मविचेष्टितम्॥ ३६

etadbhagavato rūpaṃ brahmaṇaḥ paramātmanaḥ|

paraṃ pradhānaṃ puruṣaṃ daivaṃ karmaviceṣṭitam|| 36

अर्थ

भगवान् परमात्मा परब्रह्मका अद्भुत प्रभावसम्पन्‍न तथा जागतिक पदार्थोंके नानाविध वैचित्र्यका हेतुभूत स्वरूपविशेष ही ‘काल’ नामसे विख्यात है। प्रकृति और पुरुष इसीके रूप हैं तथा इनसे यह पृथक् भी है। नाना प्रकारके कर्मोंका मूल अदृष्ट भी यही है तथा इसीसे महत्तत्त्वादिके अभिमानी भेददर्शी प्राणियोंको सदा भय लगा रहता है॥ ३६-३७॥✎ 335

यह अर्थ श्लोक 36–37 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #335 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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