माताजी! इस प्रकार मैंने तुम्हारे लिये भक्तियोग और अष्टांगयोगका वर्णन किया। इनमेंसे एकका भी साधन करनेसे जीव परमपुरुष भगवान्को प्राप्त कर सकता है॥ ३५॥✎ 335
भक्तियोगश्च योगश्च मया मानव्युदीरितः।
ययोरेकतरेणैव पुरुषः पुरुषं व्रजेत्॥ ३५
माताजी! इस प्रकार मैंने तुम्हारे लिये भक्तियोग और अष्टांगयोगका वर्णन किया। इनमेंसे एकका भी साधन करनेसे जीव परमपुरुष भगवान्को प्राप्त कर सकता है॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 383) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/29/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)