श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.11

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्‍च किल्बिषान्।

प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्‍वरान् गुणान्॥ ११

prāṇāyāmairdaheddoṣāndhāraṇābhiśca kilbiṣān|

pratyāhāreṇa saṃsargāndhyānenānīśvarān guṇān|| 11

अर्थ

अतः योगीको उचित है कि प्राणायामसे वात-पित्तादिजनित दोषोंको, धारणासे पापोंको, प्रत्याहारसे विषयोंके सम्बन्धको और ध्यानसे भगवद्विमुख करनेवाले राग-द्वेषादि दुर्गुणोंको दूर करे॥ ११॥✎ 326

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #326 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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