श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.10

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

मनोऽचिरात्स्याद्विरजं जितश्वासस्य योगिनः।

वाय्वग्‍निभ्यां यथा लोहं ध्मातं त्यजति वै मलम्॥ १०

mano'cirātsyādvirajaṃ jitaśvāsasya yoginaḥ|

vāyvagnibhyāṃ yathā lohaṃ dhmātaṃ tyajati vai malam|| 10

अर्थ

जिस प्रकार वायु और अग्‍निसे तपाया हुआ सोना अपने मलको त्याग देता है, उसी प्रकार जो योगी प्राणवायुको जीत लेता है, उसका मन बहुत शीघ्र शुद्ध हो जाता है॥ १०॥✎ 326

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #326 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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