वाय्वग्निभ्यां यथा लोहं ध्मातं त्यजति वै मलम्॥ १०
mano'cirātsyādvirajaṃ jitaśvāsasya yoginaḥ|
vāyvagnibhyāṃ yathā lohaṃ dhmātaṃ tyajati vai malam|| 10
अर्थ
जिस प्रकार वायु और अग्निसे तपाया हुआ सोना अपने मलको त्याग देता है, उसी प्रकार जो योगी प्राणवायुको जीत लेता है, उसका मन बहुत शीघ्र शुद्ध हो जाता है॥ १०॥✎ 326
मनोऽचिरात्स्याद्विरजं जितश्वासस्य योगिनः।
वाय्वग्निभ्यां यथा लोहं ध्मातं त्यजति वै मलम्॥ १०
जिस प्रकार वायु और अग्निसे तपाया हुआ सोना अपने मलको त्याग देता है, उसी प्रकार जो योगी प्राणवायुको जीत लेता है, उसका मन बहुत शीघ्र शुद्ध हो जाता है॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.28.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 374) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/28/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)