श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

अत एव शनैश्चित्तं प्रसक्तमसतां पथि।

भक्तियोगेन तीव्रेण विरक्‍त्या च नयेद्वशम्॥ ५

ata eva śanaiścittaṃ prasaktamasatāṃ pathi|

bhaktiyogena tīvreṇa viraktyā ca nayedvaśam|| 5

अर्थ

इसलिये बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि असन्मार्ग (विषय-चिन्तन) में फँसे हुए चित्तको तीव्र भक्तियोग और वैराग्यके द्वारा धीरे-धीरे अपने वशमें लावे॥ ५॥

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