श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते।

ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा॥ ४

arthe hyavidyamāne'pi saṃsṛtirna nivartate|

dhyāyato viṣayānasya svapne'narthāgamo yathā|| 4

अर्थ

जिस प्रकार स्वप्नमें भय-शोकादिका कोई कारण न होनेपर भी स्वप्नके पदार्थोंमें आस्था हो जानेके कारण दुःख उठाना पड़ता है, उसी प्रकार भय-शोक, अहं-मम एवं जन्म-मरणादिरूप संसारकी कोई सत्ता न होनेपर भी अविद्यावश विषयोंका चिन्तन करते रहनेसे जीवका संसार-चक्र कभी निवृत्त नहीं होता॥ ४॥

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