श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.8

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः।

भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषं प्रकृतेः परम्॥ ८

kāryakāraṇakartṛtve kāraṇaṃ prakṛtiṃ viduḥ|

bhoktṛtve sukhaduḥkhānāṃ puruṣaṃ prakṛteḥ param|| 8

अर्थ

कार्यरूप शरीर, कारणरूप इन्द्रिय तथा कर्तारूप इन्द्रियाधिष्ठातृ-देवताओंमें पुरुष जो अपनेपनका आरोप कर लेता है, उसमें पण्डितजन प्रकृतिको ही कारण मानते हैं तथा वास्तवमें प्रकृतिसे परे होकर भी जो प्रकृतिस्थ हो रहा है, उस पुरुषको सुख-दुःखोंके भोगनेमें कारण मानते हैं॥ ८॥✎ 317

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #317 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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