श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

तदस्य संसृतिर्बन्धः पारतन्त्र्यं च तत्कृतम्।

भवत्यकर्तुरीशस्य साक्षिणो निर्वृतात्मनः॥ ७

tadasya saṃsṛtirbandhaḥ pāratantryaṃ ca tatkṛtam|

bhavatyakarturīśasya sākṣiṇo nirvṛtātmanaḥ|| 7

अर्थ

इस कर्तृत्वाभिमानसे ही अकर्ता, स्वाधीन, साक्षी और आनन्दस्वरूप पुरुषको जन्म-मृत्युरूप बन्धन एवं परतन्त्रताकी प्राप्ति होती है॥ ७॥✎ 317

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #317 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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